Saturday, 22 April 2017


'ख़ुशी' जूनून है

डूबी हूँ मैं तेरे हर्फ़ हर्फ़ में इस कदर...
मेरे खुद के लफ्ज़ मेरी जुबां में ही गल जाते हैं..


किसी और के अलफ़ाज़ मुझमे उतरते ही नहीं फिर
वो मेरे बाहरी वज़ूद से ही फिसल जाते हैं....


लिखा था तुझे सफ़ा सफ़ा, अपने आईने में एक दिन 
अब आइना देखती हूँ तो सारे लोग जल जाते हैं..


'ख़ुशी' जूनून है, 'ख़ुशी 'शौक है..'ख़ुशी' उफान जज़्बों का..
'ख़ुशी 'संजीदगी जिसकी देहलीज़ पर अक्स पिघल जाते हैं..
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कैसी फितरत का है.

उफ़ तेरी आराइश-ऐ-महफ़िल, तेरा आब-ऐ-नजराना 
 तेरा ये लोगों को जतलाना कि तू उनको अफ़सुर्दा नहीं करता


मैं आकिल तो हूँ इतना कि, तुझे गद्दार कह सकूं 
भरी महफ़िल में मगर दोस्तों को बेपर्दा नहीं करता...


मुझे एहतियाज नहीं जरा भी, कोई एहतियात बरतने की..
मैं अपने आप में जो हूँ..बड़ा ही बेमिसाल हूँ


मेरी शीशे सी साफ़ नियत में तू चेहरा देख ले अपना
खुद्दार हूँ कि अपने ऐब पर पर्दा नहीं करता 


तू बे-नजीर है अपनी बज़्म में, लोगो से सुना मैंने
मेरे दानिश्ता तू नायाब है...तूने ही बताया था 


तू नूर-ऐ-कचनार है पर कैसी फितरत का है..
तेरे आगोश में बसने वालों को भी तू ज़र्दा नहीं करता...

Thursday, 2 March 2017

'चार लोग' (मेरी पहली हास्य कविता)



बुजुर्ग फैशन टीवी में और बच्चे बिजी हो गए पोगो में....
ज़माना सिमट गया और रह गया उन चार लोगों में...
जिनके कुछ कह देने से सारे लोग डरते हैं..
चार लोग क्या कहेंगे..बस इसकी परवाह करते हैं..
हालाँकि वो चार लोग जीवन भर किसी के काम नही आते..
पर उनको किसी के घर के कोई इंतेजाम नही भाते...
आखिर में वो चार लोग सिर्फ यही करते हैं..
मुर्दा हो जाता है इंसान जब उसे कंधे पे धरते हैं...
इतनी सी बात के लिए उन चार लोगों का कोहराम है..
उन चार लोगों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम है..
anamika sharma 'khushi'

नदी और समुन्दर



तुझसे बड़ा हूँ..पर तेरे सामने जरा सा क्यूँ हूँ..
समुन्दर पूछने लगा नदी से...मैं प्यासा क्यूँ हूँ..
तू मस्त, तू हसीं...तू ख़ुशी ताज़ी ताज़ी 
मैं तनहा, मैं एकाकी...मैं बासा क्यूँ हूँ..
तेरे दस ठौर. दस ठिकाने..सैकड़ों राहें तेरी..
किसी कठोर शहंशाह की तरह मैं बुरा सा क्यूँ हूँ..
तू मीठी,,तू प्यासों में अमृत भरने वाली...
मैं खारा, मैं प्यास बुझाने वाली झूठी दिलासा क्यूँ हूँ..
नदी मुस्कुराई धीमे से...बड़े प्यार से बोली..
मुझमे दम्भ नही जरा सा..मैं हूँ बहुत भोली..
ऊँचे किसी पहाड़ से छोटे से रूप में..
निकली हूँ मै और निखरी हूँ मै छांव,धूप में..
कई मोड़ आते हैं मेरी ज़िन्दगी मे..मैं स्वीकार करती हूँ..
मैं सबका साथ देती हूँ..मैं सबको प्यार करती हूँ..
पशु, पक्षी, पेड़, प्राणी..मैं सबकी प्यास भरती हूँ..
मैं जीवन मेखला होकर भी न इसका दम्भ करती हूँ..
हजारों मील बहकर..कष्ट सहकर..मैं तुमसे मिलती हूँ..
तुम छीन लेते हो अस्तित्व मेरा. मैं ख़ामोशी सिलती हूँ..
यही बात है..तुममे खोकर भी मेरा मान बचा सा क्यूँ है..
तुम्हारा होना न होना यहाँ पर..हवा सा क्यूँ है..

Tuesday, 5 July 2016


२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल


गीली माटी पर एड़ी रखकर गोल घुमाना याद है
रंग बिरंगी बना पतंगें, छत पे उड़ाना याद है 


छोटे बड़े कंचों के खजाने का, जान से प्यारा हो जाना 
चुपके चुपके मम्मी के पर्स से टॉफ़ी खाना याद है..


हर साइज के गुड्डे गुड़िया लेकर, रोजाना उनकी लाइफ चलाना
एक दूजे के बाल बनाना, मेकअप करना याद है...


घर की टंकी पर डॉल का स्विमिंग पूल बनाना याद है...
carrom की गोटी हम वाइट ही लेंगे, उस पर लड़ना याद है. .


पथ कुटटे के गेम खेलने गिट्टी से, वो 5 'नगीने' चुन लाना 

बाजू वाली आंटी के छत से, पोटैटो चिप्स चुराना याद है 

खेल खिलौनों के बटवारे पर कितनी भी हाथापाई हो जाए
कितनी भी हो जाए लड़ाई, मम् को न बताना याद है...


डॉल का बर्थडे, डॉल की वेडिंग..हर बात पे महीनों की प्लानिंग..
पॉकेट मनी से 'नन्दीश्वर पार्क' में पिकनिक जाना याद है...


फॉक्स किड्स की मिमिक्स में घर जो चिड़ियाघर बन जाता था....
मम्मी के ऑफिस से आने से पहले, आनन फानन में जमाना याद है.


25K per month कमाकर भी खुश न रहने वाली जनरेशन को,
२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल पर दुनिया पा जाना याद है...

Friday, 18 September 2015

'हृदयहीनता'

निपट सरल भी और अविरल भी,
निर्भेद्य भी हैं, निर्बाध भी फिर भी
निराधार नियत नियमों के चलते...
किंचित वे निष्ठुर बनकर रहते हैं.........
निश्चितता पर भी निश्चिंत नहीं..
निर्भीक नहीं..निष्फिक्र नहीं
ये कैसी निर्ममता है जिसके नाते
निष्ठा को भी निरर्थक कहते हैं..
निराकार निपट कुछ भाव निरंकुश...
निर्दोष नही रह जाते उस क्षण
नीर भरे दो नयन निरीह जब....
निश्छलता का फल सहते हैं..
निर्माण भी हैं...निर्याणक भी हैं
और निर्माण के निर्णायक फिर भी
अपनी निष्ठुरता को न जाने क्यूँ,
'हृदयहीनता' कहते हैं.....