Friday, 7 February 2014

पलाश

है पलाश की महिमा अदभुत, निश्छल रूप अति स्वच्छंद..........!! 

कोई अवधूत सा बैठा एकांत में, नितांत समय का जो पाबन्द.........!!
जब पतझड़ आये, सब झड़ जाए, बंजर वन में जा पहुंचा 
दूर दूर तक हरीतिमा न पर वो कानन में जा पहुंचा 
उसके तेज का प्रताप प्रमाणित, धधक रहे अंगारक पुष्प 
इधर उधर पर बिखर बिखर सौभाग्य शिखर पर जा पहुंचा 

एक दिन जैसे सृष्टि रचेता ने खेल नया कोई खेला हो
लोग कहें दावानल सा उसको या अग्नि कणो का रेला हो
मुट्ठी में भर फेंक दिए हों ज्यो कोटि केसरिया मोती
प्रत्येक मोती में हुई उत्पन्न हो जैसे सौ सौ दीपक की ज्योति
वो तो पृथ्वी का प्रिय पुत्र पर उसका यश अम्बर पर जा पहुंचा....!!

फिर किसी कला के प्रेमी ने सारे ज्योति पुष्पो को उठाया हो
बड़े प्रेम से संजो संजो कर डाल डाल पे जमाया हो
उसके विशाल ह्रदय पर आश्रित, तरह तरह के सुन्दर नभचर
फिर भी उफ़ न करता संतोषी, प्रेम प्रतीक सा दृष्टिगोचर
उसके मोहपाश में बंधकर, बसंत भी दर पर जा पहुंचा

कोई प्रेमी अपनी रसिका को चाहे उसके पुष्पो से मनाये नहीं
उसके पुष्पो कि वेणी बनाकर कोई रूपसी केश सजाये नही
फिर भी उसके खिले जो गुंचे, कोई प्रेम कली जाती है चटक
हुआ आगमन बसंत ऋतू का, कहती सुंदरियां केश झटक
कभी कभी गुलदस्ता बनकर किसी के घर पर जा पहुंचा

है बिखरा देता जगह जगह पर, अपने रूप रंग का चमत्कार
उसका केसरिया वस्त्रो से, अलंकरणों से, खुद बसंतराज करता श्रृंगार
और किसी अतिथि सा आकर, दो तीन मास पृथ्वी पे बिताकर
रंगो का उत्सव सा मनाकर, प्रेम निमंत्रण पत्र थमाकर
फिर आने का कहकर सबके, ह्रदय के अंदर जा पहुंचा........!!



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