Friday, 7 February 2014

My Masterpiece.......शीतल शरद समीर

शीतल सरल शरद समीर से
तुम सहज ही घुल मिल जाते हो
मधुकर से तुम मधु ऋतू में

आते हो फिर जाते हो
चंचलता नैनों में तुम्हारे
मनमोहक ये छवि तुम्हारी
मंद मधुर मुस्कान अधर पर
ह्रदय पटल छू जाते हो...!

राग विराग अनुराग रंग के,
तुम में रूप हज़ारों हैं..
उत्कर्ष उमंग और नव तरंग से,
तुम संग अगर हो जाते हो..
आस पास विश्वास वास का
आभास निरंतर होता है
इधर उधर जो बिखर बिखर कर
उल्लास शिखर हो जाते हो....!

केसरिया पलाश लता भी
जैसे वसंत की सुषमा हो...
देह भी ज्यों स्नेह गह और
सतत प्रेम की ऊष्मा हो..
ओस कणों के रस को पीकर
धवल चांदनी बिछा बिछा कर
दिवस काल के बने सुधाकर
क्या शाम ढले सो जाते हो...!

नंदन वन के पुष्प विमल
श्वेत कमल सा उर निर्मल
कनक मणि की खनक ध्वनि सा
मन चंचल मनसा कोमल
हरित पर्ण के सम पुलकित
हर्ष भरे शोभित सुरभित
स्वयं कृति कृत स्वप्न देख कर
नित आनंदित हो जाते हो...!

समर शत्रु से संघर्ष किये
क्षण क्षण में मर्म स्पर्श लिए
जीवन के चरमोत्कर्ष को पाकर
प्रतिदिन नव निष्कर्ष लिए
बीत चुके की सुध बुध खोकर
विरह विरह के विरह विसर कर
क्षितिज पार से आये तो हो
पर पुनः कहाँ खो जाते हो...!!

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