Monday, 3 March 2014

आज फिर चले आओ...




उठ रही है सांस सांस, क्यों सुवास कोई मनचली
गुजरे पल, फिर गुजरे दिन, फिर मास काफी गुजर गये
हुआ नही आभास ये मुझको, अनायास तुम्हारी बन चली
मुझे सतत एहसास तुम्हारा, है नहीं विश्वास तुमको
मैंने दिल की हर परत से, बना लिया कुछ ख़ास तुमको
लग नहीं रहा कहीं पे, मन बेचारा बेमन है....
आज फिर चले आओ, प्रेम का निवेदन है............!!

तुम अगर सागर विशाल, मैं नदी बनूँ, निर्झरा बनूँ
तुम अगर आकाश विस्तृत, सब सहूँ और धरा बनूँ
मैं मृदा जो बस तुम्हारे प्रेम रस में भींगी हुई
उत्सुक बहुत तुम जो कहो पूरा नहीं तो ज़रा बनूँ
मैं तुम्हारी चेतना, फिर भाव क्यों अचेतन है.....
आज फिर चले आओ, प्रेम का निवेदन है.......!!

तुम वही चट्टान हिम की, मैं जलती ज्वाला आज फिर
दे दिया हर अन्धकार को उजाला आज फिर
हर रास्ते के दो तरफ, सजाये हैं दीपक आस के
कोई दिल का बहुत प्रिय, ज्यों आने वाला आज फिर
तन तो पहले भी यही था, प्राण से अब सम्मेलन है...
आज फिर चले आओ...प्रेम का निवेदन है...........!!


भूल बैठे हो डगर कह, किसी बहाने आ जाओ
मैं निभाऊं हर कसम, तुम आजमाने आ जाओ
मैंने सारे किये जतन उस चित्रकारी को भरने के
बना दिए निर्जीव पात्र, तुम प्राण जगाने आ जाओ
लोग अब कहने लगे हैं, मुझमे तुझमे अनबन है....
आज फिर चले आओ...प्रेम का निवेदन है..........!!
 

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