Sunday, 30 March 2014

जलते शोले

सर्द फ़िज़ाएं हर शाम सहर अब
बर्फ हवा में जैसे घोलें.......

कभी कभी मिलती है फुर्सत
कुछ मैं बोलूं, कुछ तू बोले......

मन में टीस सी उठती है की 
जुबाँ कहीं ये राज न खोले 

न जाने कब जुल्फ के बादल 
कचनारों के अंक में सोले

दिल कहता है मौका मिलते ही
मन के कलुष को प्रेम से धोले 

बहुत देर हुई चर्चा करते 
राख में दब गये जलते शोले.......!!

1 comment:

  1. Life is short for even to love how some involve in hate & destruction.,really such are abnormal .Try to change them is efficacious for human society.

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