Wednesday, 7 May 2014

मासूमियत

ये अँधेरा घना होगा, शमा जलानी पड़ेगी...!!
मुझे ही उस जानिब ना जाने की कसम भुलानी पड़ेगी...!!

कुछ इस कदर बोझ है उसकी मासूमियत का मुझपर
शराफत उसके हिस्से की भी निभानी पड़ेगी...!!

फिर दरवाजे पे हुई किसी के कदमों की आहट
तकिये के नीचे उसकी तस्वीर दबानी पड़ेगी....!!

तेरा अक्स ज़िंदा है, तेरी हर याद की तरह...
शीशे की दीवारो क पीछे दीवानगी छुपानी पड़ेगी...!!

तेरी रुखसत क बाद शुरू हुआ शेरोशायरी का सिलसिला 
कोई तो नयी तलब 'खुशी' ज़िंदगी में लानी पड़ेगी......!!

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