Saturday, 15 February 2014

ऐहसान

बना दिया खुदा ने तुम्हे किसी दिन
इस जहान की खातिर...
इंसानियत है लाजिमी इंसान की खातिर...
मत ज़र्रा ज़र्रा जला ये नक्से नजाकत है
दिल मिलता है की जी सकें जिस्मोजान की खातिर....
हमने तब भी कहा था, हम आज भी कहते हैं
सबसे हंसके न मिला करो हिफाजते ईमान की खातिर...
तुम्हारी दोस्ती के बावस्ता ख़ुशी है 'ख़ुशी' को
गुमान होता है हरसूँ तुम्हारे ऐहसान की खातिर....!!!

Friday, 7 February 2014

My Masterpiece.......शीतल शरद समीर

शीतल सरल शरद समीर से
तुम सहज ही घुल मिल जाते हो
मधुकर से तुम मधु ऋतू में

आते हो फिर जाते हो
चंचलता नैनों में तुम्हारे
मनमोहक ये छवि तुम्हारी
मंद मधुर मुस्कान अधर पर
ह्रदय पटल छू जाते हो...!

राग विराग अनुराग रंग के,
तुम में रूप हज़ारों हैं..
उत्कर्ष उमंग और नव तरंग से,
तुम संग अगर हो जाते हो..
आस पास विश्वास वास का
आभास निरंतर होता है
इधर उधर जो बिखर बिखर कर
उल्लास शिखर हो जाते हो....!

केसरिया पलाश लता भी
जैसे वसंत की सुषमा हो...
देह भी ज्यों स्नेह गह और
सतत प्रेम की ऊष्मा हो..
ओस कणों के रस को पीकर
धवल चांदनी बिछा बिछा कर
दिवस काल के बने सुधाकर
क्या शाम ढले सो जाते हो...!

नंदन वन के पुष्प विमल
श्वेत कमल सा उर निर्मल
कनक मणि की खनक ध्वनि सा
मन चंचल मनसा कोमल
हरित पर्ण के सम पुलकित
हर्ष भरे शोभित सुरभित
स्वयं कृति कृत स्वप्न देख कर
नित आनंदित हो जाते हो...!

समर शत्रु से संघर्ष किये
क्षण क्षण में मर्म स्पर्श लिए
जीवन के चरमोत्कर्ष को पाकर
प्रतिदिन नव निष्कर्ष लिए
बीत चुके की सुध बुध खोकर
विरह विरह के विरह विसर कर
क्षितिज पार से आये तो हो
पर पुनः कहाँ खो जाते हो...!!

My MasterPiece- 2 continued after शीतल शरद समीर

ग्रीष्मकाल की रजनी कंहू या शशिर ऋतू का वासर तुमको
श्वास कंहू, विश्वास कंहू, दिवा कंहू या दिवाकर तुमको 
तन में, मन में और जन जन में 
बंजर भूमि में, उपवन में
बियावान वन में, जीवन में
क्यों स्वप्न नवल बो जाते हो?

आचार, विचार मंडित छवि पर, कुछ सदाचार के रत्न जटित
आकार विकार हीन वसुधा की निराकार शोभा वर्णित
गीतों की सरगम में हरदम
वर्षा की रिम झिम में छम छम
दीपक की टिम टिम में भी कैसे
नग सम हिम बन जाते हो?

कभी चन्द्र सा, कभी चन्दन सा, कभी चंद्रभान सा प्रकाश गिरा
बन सावन क्षण क्षण में कैसे कर जाते हो धरा को हरा भरा
अम्बु से, अवनि से, अम्बर से
सर, सागर से या सरोवर से
घन से, घटा से या निर्झर से
भर सुधा घट कहाँ से लाते हो?

सुमन सामान पुलकित मुख पर, जाने अनजाने रहस्य रमा
वाणी की शुचिता भी ऐसी, ज्यों जिव्हा पर हो मधु जमा
नभचर भांति वन विचरण में
निशिचर भांति जागरण में
देव, मनुज, गन्धर्व, निशाचर का
मधुर मिलन बन जाते हो |

हरित पर्ण के धानी वर्ण में, प्रकृति का जो लावण्य निहित
ऋतू, ऋचा, रिद्धिमा पूजक सम, प्रसून, प्रसाद और प्राञ्जल्य सहित
बाग़ हुए, बागान हुए
बन गुंजन गुंजायमान हुए
कर्ण प्रिय सा गान हुए तुम
हर कलरव में बस जाते हो ||

फितरत

फूलो के रंग उड़ गए, दरख़्त नमी को भूल गये....

हमी ने दिखाई जन्नत और वो हमी को भूल गए......


किस्सा कुछ दिन ब दिन हो चला है ऐसा.......


फलक की चाह करते रहे, जमीं को भूल गये.....


चर्चे बहुत सुने थे उसके, हुआ सामना एक दिन.....


उसकी दीवानगी में बेशक हर कमी को भूल गये......


बड़ी हैरतंगेज है ख़ुशी गुनाहगारों की फितरत.......

 
खुद के खौफ क आगे आदमी को भूल गये...........!!

उन्स

कौन कहता है जिन्दगी से उन्स न रहा 

कौन कहता है जमाने से प्यार न रहा


संगो खिस्त की दीवारों से निकलकर 


कौन कहता है मेरा घर बार न रहा 


एक बार मुडके देखने में क्या जाता है तेरा


जाते जाते भी हमको करार न रहा


अब शिकायतों का मौका बचा भी नही कोई


वो बैरी न रहा वो यार न रहा..............!!!!!!!

ख़ुशी

मुझको अपने अक्स की कुछ रौशनी दे दो

मेरी सारी जिन्दगी के बदले तुम्हारी सादगी दे दो


कुछ बात तो जरूर उस शख्स में होगी 


खुद चाँद जिस से कहता हैं चांदनी दे दो


कुछ दीवाने अपने ही ख्वाबो के ऐसे भी होते हैं 


जो कहते हैं वीरानियों से कि दीवानगी दे दो


सांझ होते ही पंछी सभी लौट आये ठिकानो पे अपने


लगे सोचने कोई दो पल कि ही सही मगर 'ख़ुशी' दे दो

प्यार

प्यार अगर न होता जग में
सारा जग बंजारा होता.......... 


ईश्वर तक अपराधी होता 
सारा खेल दुबारा होता.......... 


कायनात ये सारी, लोग सभी 
एक दूजे से बेगाने होते.........


जग सारा स्वार्थ में जीता मरता 
हर कोई मन से हारा होता...........

 
श्रृष्टि सारी रीती होती 
रात कभी न दुल्हन बनती........


मैं भी शायद सुन न पाती 
लाख किसी ने पुकारा होता.........

पलाश

है पलाश की महिमा अदभुत, निश्छल रूप अति स्वच्छंद..........!! 

कोई अवधूत सा बैठा एकांत में, नितांत समय का जो पाबन्द.........!!
जब पतझड़ आये, सब झड़ जाए, बंजर वन में जा पहुंचा 
दूर दूर तक हरीतिमा न पर वो कानन में जा पहुंचा 
उसके तेज का प्रताप प्रमाणित, धधक रहे अंगारक पुष्प 
इधर उधर पर बिखर बिखर सौभाग्य शिखर पर जा पहुंचा 

एक दिन जैसे सृष्टि रचेता ने खेल नया कोई खेला हो
लोग कहें दावानल सा उसको या अग्नि कणो का रेला हो
मुट्ठी में भर फेंक दिए हों ज्यो कोटि केसरिया मोती
प्रत्येक मोती में हुई उत्पन्न हो जैसे सौ सौ दीपक की ज्योति
वो तो पृथ्वी का प्रिय पुत्र पर उसका यश अम्बर पर जा पहुंचा....!!

फिर किसी कला के प्रेमी ने सारे ज्योति पुष्पो को उठाया हो
बड़े प्रेम से संजो संजो कर डाल डाल पे जमाया हो
उसके विशाल ह्रदय पर आश्रित, तरह तरह के सुन्दर नभचर
फिर भी उफ़ न करता संतोषी, प्रेम प्रतीक सा दृष्टिगोचर
उसके मोहपाश में बंधकर, बसंत भी दर पर जा पहुंचा

कोई प्रेमी अपनी रसिका को चाहे उसके पुष्पो से मनाये नहीं
उसके पुष्पो कि वेणी बनाकर कोई रूपसी केश सजाये नही
फिर भी उसके खिले जो गुंचे, कोई प्रेम कली जाती है चटक
हुआ आगमन बसंत ऋतू का, कहती सुंदरियां केश झटक
कभी कभी गुलदस्ता बनकर किसी के घर पर जा पहुंचा

है बिखरा देता जगह जगह पर, अपने रूप रंग का चमत्कार
उसका केसरिया वस्त्रो से, अलंकरणों से, खुद बसंतराज करता श्रृंगार
और किसी अतिथि सा आकर, दो तीन मास पृथ्वी पे बिताकर
रंगो का उत्सव सा मनाकर, प्रेम निमंत्रण पत्र थमाकर
फिर आने का कहकर सबके, ह्रदय के अंदर जा पहुंचा........!!



कशमकश

कशमकश 

धूल कि परतें जमीं है जिसमे वो अफसाना किसका है.......दिल की दुनिया में टूटा घर, शहर पुराना किसका है.................!!



उसको तो मिली विरासत में थी अपना बनाने कि तरकीब.......
सारे लोग जो अपने उसके तो वो आज बेगाना किसका है............!!



शरमा गयी क्यों उसकी शराफत, उस से जब ये पूछा तो..........मयखानों कि गली में आजकल ठौर ठिकाना किसका है............!!



आते जाते लोग ये सोचें उसकी नजरें देखें तो...........उन झील सी गहरी आखों में वो राज पुराना किसका है............!! 



एक तरफ कायनात ये सारी, एक तरफ बस धवल चांदनी..........चाँद बेचारा बैठा सोचे साथ निभाना किसका है...............!!



आज निगाहें उसकी जैसे पूछ रही थी सब से ये...........बहुत दीवाने प्यार में लेकिन प्यार दीवाना किसका है.........!!