Wednesday, 8 July 2015

एकाग्र मनन


ये साँझ की नीरवता है या फिर..
मेरा तुम पर एकाग्र मनन...
क्या बात है सौ झंझावातों में भी...
हर सांस तुम्हारी सुनता हूँ..
डपट दिया सृष्टि की दिनचर्या को सहसा...
हे धरा, सरासर ठहर ज़रा....
कुछ ख़ास तो बेशक हुआ चला है...
क्यों उल्लास तुम्हारा बनता हूँ..
मैं कान लगाए बैठा हूँ..
हर पलछिन इस उम्मीद में कि...
सुन पाऊँ हर धड़कन तेरी....
हर अहसास तुम्हारा चुनता हूँ..
बस चाह यही,,रुक जाये ये कुदरत
जब एक तेरी आवाज़ सुनूं...
फिर निश्छल सुर की झंकार गूंथकर
विश्वास तुम्हारा बुनता हूँ...