Thursday, 2 March 2017

नदी और समुन्दर



तुझसे बड़ा हूँ..पर तेरे सामने जरा सा क्यूँ हूँ..
समुन्दर पूछने लगा नदी से...मैं प्यासा क्यूँ हूँ..
तू मस्त, तू हसीं...तू ख़ुशी ताज़ी ताज़ी 
मैं तनहा, मैं एकाकी...मैं बासा क्यूँ हूँ..
तेरे दस ठौर. दस ठिकाने..सैकड़ों राहें तेरी..
किसी कठोर शहंशाह की तरह मैं बुरा सा क्यूँ हूँ..
तू मीठी,,तू प्यासों में अमृत भरने वाली...
मैं खारा, मैं प्यास बुझाने वाली झूठी दिलासा क्यूँ हूँ..
नदी मुस्कुराई धीमे से...बड़े प्यार से बोली..
मुझमे दम्भ नही जरा सा..मैं हूँ बहुत भोली..
ऊँचे किसी पहाड़ से छोटे से रूप में..
निकली हूँ मै और निखरी हूँ मै छांव,धूप में..
कई मोड़ आते हैं मेरी ज़िन्दगी मे..मैं स्वीकार करती हूँ..
मैं सबका साथ देती हूँ..मैं सबको प्यार करती हूँ..
पशु, पक्षी, पेड़, प्राणी..मैं सबकी प्यास भरती हूँ..
मैं जीवन मेखला होकर भी न इसका दम्भ करती हूँ..
हजारों मील बहकर..कष्ट सहकर..मैं तुमसे मिलती हूँ..
तुम छीन लेते हो अस्तित्व मेरा. मैं ख़ामोशी सिलती हूँ..
यही बात है..तुममे खोकर भी मेरा मान बचा सा क्यूँ है..
तुम्हारा होना न होना यहाँ पर..हवा सा क्यूँ है..

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