Saturday, 28 October 2017




विजय-ध्वजा


वो चला तो वो भी चले चली, वो रुका तो वो भी ठहर गयी..
वो मुड़ा तो उसने मोड़ चुना, वो गिरा तो पूरी सिहर गयी..
क्या बात है 'औरत' होना भी, दुनिया की सारी ज़िंदादिली सा 
जब मन हो, बन गयी पतंग और विजय-ध्वजा सी फहर गयी..
वो डोर खींचकर उड़ा रहा, वो मौज मजे में उडी चली..
वो उसको अपनी शान समझ..औरों से कटने बचा रहा..
वो हिफ़ाज़तों पर फख्र किये, उसके इशारों पर दौड़ी चली..
वो उसको अपनी 'चीज़' समझ कीमत का शोर मचा रहा...
वो 'पतंग' है उसकी, सुन्दर है, पतली है और रूपहली भी 
देखो कितना खुशकिस्मत हूँ मैं, यार-दोस्तों में सुना रहा
एक दिन डोर कटी पतंग की तब उसने छज्जे से नीचे झाँका
कौन लूट ले गया पतंग..सब परिप्रेक्ष्य बराबर से आँका 
तब पीछे से एक हाथ बढ़ा, वो घबराकर पलट गया, देखा 
पीछे 'पतंग' खड़ी थी, कैसे लांघ गयी लक्ष्मण रेखा...
डोर तोड़कर भी खड़ी है पगली दूर नहीं जा पाई है..
पूछा उसके पौरुष ने ये क्या सनक लगाईं है....
 बाँध रखा है तुमको मैंने, कैसे बंधन खोलोगी...
खड़ी खड़ी क्या देख रही हो, कुछ पूछा है, कुछ बोलोगी..?
ज़ुल्फ़ झटक, कुछ कदम पटक..वो मुस्काई और बोली  
ये बंधन बंधा हुआ है क्युकी मैंने गाँठ नहीं खोली..
चालाकी भरी रसोई में जो खुदगर्जी की थाली पर 
तुम धोखे परोसा करते हो, मैं धोखे खाती आई हूँ
मैं जीत न लूँ दुनिया एक दिन, और बन न जाओ बंधक तुम 
मुझ पर बाँध बनाने खातिर षड़यंत्र रचाते आये हो  
हे 'पुरुष' तुम्हारी बुद्धिमत्ता का वाक़ई कोई जवाब नहीं 
तुम रस्म बनाते आये हो, मैं रस्म निभाते आई हूँ 
मैं शीतल हूँ, ममतामयी हूँ, कोमल हूँ और हृदयवान भी 
ये बातें ही तुमको लगता है कमजोर बना देंगी मुझको
तुम प्रेम के झूठे इंद्रजाल पर मुझे झुकाने आये हो 
तुम प्यार जताने आये हो, मैं प्यार बनाते आई हूँ
अरे वही पुरुष तो है ये, हिम्मत करके जैसे तैसे 
पूंछ रहा है एक औरत से, मैं याचक तुम दाता कैसे 
वो रस्मो की ज़रदोजी में लिपटी, इठलाई..इठलाकर बोली  
घुटनों पड़कर, हाथ बढ़ाकर, अरसो से कई बरसो से 
तुम साथ मांगते आये हो, मैं साथ निभाते आई हूँ...

Saturday, 22 April 2017


'ख़ुशी' जूनून है

डूबी हूँ मैं तेरे हर्फ़ हर्फ़ में इस कदर...
मेरे खुद के लफ्ज़ मेरी जुबां में ही गल जाते हैं..


किसी और के अलफ़ाज़ मुझमे उतरते ही नहीं फिर
वो मेरे बाहरी वज़ूद से ही फिसल जाते हैं....


लिखा था तुझे सफ़ा सफ़ा, अपने आईने में एक दिन 
अब आइना देखती हूँ तो सारे लोग जल जाते हैं..


'ख़ुशी' जूनून है, 'ख़ुशी 'शौक है..'ख़ुशी' उफान जज़्बों का..
'ख़ुशी 'संजीदगी जिसकी देहलीज़ पर अक्स पिघल जाते हैं..
.

कैसी फितरत का है.

उफ़ तेरी आराइश-ऐ-महफ़िल, तेरा आब-ऐ-नजराना 
 तेरा ये लोगों को जतलाना कि तू उनको अफ़सुर्दा नहीं करता


मैं आकिल तो हूँ इतना कि, तुझे गद्दार कह सकूं 
भरी महफ़िल में मगर दोस्तों को बेपर्दा नहीं करता...


मुझे एहतियाज नहीं जरा भी, कोई एहतियात बरतने की..
मैं अपने आप में जो हूँ..बड़ा ही बेमिसाल हूँ


मेरी शीशे सी साफ़ नियत में तू चेहरा देख ले अपना
खुद्दार हूँ कि अपने ऐब पर पर्दा नहीं करता 


तू बे-नजीर है अपनी बज़्म में, लोगो से सुना मैंने
मेरे दानिश्ता तू नायाब है...तूने ही बताया था 


तू नूर-ऐ-कचनार है पर कैसी फितरत का है..
तेरे आगोश में बसने वालों को भी तू ज़र्दा नहीं करता...

Thursday, 2 March 2017

'चार लोग' (मेरी पहली हास्य कविता)



बुजुर्ग फैशन टीवी में और बच्चे बिजी हो गए पोगो में....
ज़माना सिमट गया और रह गया उन चार लोगों में...
जिनके कुछ कह देने से सारे लोग डरते हैं..
चार लोग क्या कहेंगे..बस इसकी परवाह करते हैं..
हालाँकि वो चार लोग जीवन भर किसी के काम नही आते..
पर उनको किसी के घर के कोई इंतेजाम नही भाते...
आखिर में वो चार लोग सिर्फ यही करते हैं..
मुर्दा हो जाता है इंसान जब उसे कंधे पे धरते हैं...
इतनी सी बात के लिए उन चार लोगों का कोहराम है..
उन चार लोगों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम है..
anamika sharma 'khushi'

नदी और समुन्दर



तुझसे बड़ा हूँ..पर तेरे सामने जरा सा क्यूँ हूँ..
समुन्दर पूछने लगा नदी से...मैं प्यासा क्यूँ हूँ..
तू मस्त, तू हसीं...तू ख़ुशी ताज़ी ताज़ी 
मैं तनहा, मैं एकाकी...मैं बासा क्यूँ हूँ..
तेरे दस ठौर. दस ठिकाने..सैकड़ों राहें तेरी..
किसी कठोर शहंशाह की तरह मैं बुरा सा क्यूँ हूँ..
तू मीठी,,तू प्यासों में अमृत भरने वाली...
मैं खारा, मैं प्यास बुझाने वाली झूठी दिलासा क्यूँ हूँ..
नदी मुस्कुराई धीमे से...बड़े प्यार से बोली..
मुझमे दम्भ नही जरा सा..मैं हूँ बहुत भोली..
ऊँचे किसी पहाड़ से छोटे से रूप में..
निकली हूँ मै और निखरी हूँ मै छांव,धूप में..
कई मोड़ आते हैं मेरी ज़िन्दगी मे..मैं स्वीकार करती हूँ..
मैं सबका साथ देती हूँ..मैं सबको प्यार करती हूँ..
पशु, पक्षी, पेड़, प्राणी..मैं सबकी प्यास भरती हूँ..
मैं जीवन मेखला होकर भी न इसका दम्भ करती हूँ..
हजारों मील बहकर..कष्ट सहकर..मैं तुमसे मिलती हूँ..
तुम छीन लेते हो अस्तित्व मेरा. मैं ख़ामोशी सिलती हूँ..
यही बात है..तुममे खोकर भी मेरा मान बचा सा क्यूँ है..
तुम्हारा होना न होना यहाँ पर..हवा सा क्यूँ है..

Tuesday, 5 July 2016


२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल


गीली माटी पर एड़ी रखकर गोल घुमाना याद है
रंग बिरंगी बना पतंगें, छत पे उड़ाना याद है 


छोटे बड़े कंचों के खजाने का, जान से प्यारा हो जाना 
चुपके चुपके मम्मी के पर्स से टॉफ़ी खाना याद है..


हर साइज के गुड्डे गुड़िया लेकर, रोजाना उनकी लाइफ चलाना
एक दूजे के बाल बनाना, मेकअप करना याद है...


घर की टंकी पर डॉल का स्विमिंग पूल बनाना याद है...
carrom की गोटी हम वाइट ही लेंगे, उस पर लड़ना याद है. .


पथ कुटटे के गेम खेलने गिट्टी से, वो 5 'नगीने' चुन लाना 

बाजू वाली आंटी के छत से, पोटैटो चिप्स चुराना याद है 

खेल खिलौनों के बटवारे पर कितनी भी हाथापाई हो जाए
कितनी भी हो जाए लड़ाई, मम् को न बताना याद है...


डॉल का बर्थडे, डॉल की वेडिंग..हर बात पे महीनों की प्लानिंग..
पॉकेट मनी से 'नन्दीश्वर पार्क' में पिकनिक जाना याद है...


फॉक्स किड्स की मिमिक्स में घर जो चिड़ियाघर बन जाता था....
मम्मी के ऑफिस से आने से पहले, आनन फानन में जमाना याद है.


25K per month कमाकर भी खुश न रहने वाली जनरेशन को,
२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल पर दुनिया पा जाना याद है...

Friday, 18 September 2015

'हृदयहीनता'

निपट सरल भी और अविरल भी,
निर्भेद्य भी हैं, निर्बाध भी फिर भी
निराधार नियत नियमों के चलते...
किंचित वे निष्ठुर बनकर रहते हैं.........
निश्चितता पर भी निश्चिंत नहीं..
निर्भीक नहीं..निष्फिक्र नहीं
ये कैसी निर्ममता है जिसके नाते
निष्ठा को भी निरर्थक कहते हैं..
निराकार निपट कुछ भाव निरंकुश...
निर्दोष नही रह जाते उस क्षण
नीर भरे दो नयन निरीह जब....
निश्छलता का फल सहते हैं..
निर्माण भी हैं...निर्याणक भी हैं
और निर्माण के निर्णायक फिर भी
अपनी निष्ठुरता को न जाने क्यूँ,
'हृदयहीनता' कहते हैं.....

सिरफिरा


अमूमन लोग जीते हैं 
बड़ी तरकीब से जिंदगानी...
वो बेतरतीब है, तो मेरी
 मानिंद ही सिरफिरा होगा...


सबेरे किश्तीगीर सारे
 चुन लाये समुन्दर से मोती...
मेरी ही आँख से कल रात
 आंसू कोई गिरा होगा...

शहर में चर्चे बहुत हैं..
किसी को गहरी शिकायत है..
गिला क्या, बेशक वो
 पुराना दोस्त मिरा होगा.....

ऐ बदनसीबी तेरा शैतान है मालिक,
 तो मेरा भी ख़ुदा है..
फिर फ़िज़ा के हाथो 
खिज़ा का मजा किरकिरा होगा.... 

Tuesday, 24 March 2015

तन्हापन

जितना प्यारा मुझको है तन्हापन...
उसकी आँखों से भी बहता होगा
सबके गम ढो लेने वाला.........
बोझ दिलों के सहता होगा....
काश कहीं से फिर आ जाये...
दिन रंग बिरंगे जज्बातों वाले..
मैं अपने सपने जी भर रंग लूँ...
खुद से ही वो कहता होगा...
गिन गिन कर दिन जीते जीते
उसने भी उम्र निभाई होगी
सबका साथ निभाने वाला..
तनहा तनहा रहता होगा...

Saturday, 7 March 2015

नदी

ऐसा भी क्या प्रेम नदी, ऐसा भी क्या रसरंग नदी
लोगों के लांछन, कलंक सब पाप करे बेरंग नदी
घट भरवाये, घाट बनवाए, घूंघट वालियों का पनघट छुड़वाए
हम में भी इठलाहट भर दे, तेरी मौज मजे की तरंग नदी 
कभी सिमटती, कभी मचलती, कभी उमड़ती, कभी सिकुड़ती
 कहाँ से लाये हमें दिखाने इतने रूप और रंग नदी 
जब प्यासे पथिक, पंछी, पशुओं को जी भर तृप्त यूँ करती है
उल्लास की बनकर नई परिभाषा, दे गयी खूब उमंग नदी...
जंगल में दरबार लगा, बैठे पवन, नदी, पथ, नग, मेघा, घन सब
अपनी परोपकारिता के दम पर, हो गयी सबमे दबंग नदी
आँखें मलकर, अपने अंचल पर, कूड़ा करकट जब देखा तो
उफ़ कैसी लानत है जीवन पर, हो गयी जन जन पर दंग नदी
सोलह बरस की नवयौवना सी, किसी पर्वत से उदित हो आई थी
लोगों की मलिनता धोते धोते, होती गयी बेढंग नदी..
हार गयी, अब चलते चलते, सागर में समाहित होने को ....
समझ बैठे सब प्राण-रहित, हो गयी सबसे तंग नदी....
कोई बाँध न पाये, रोक सके न, तुझमे बह ले पर सोख सके न
तू अचला पर उतनी ही चंचल, जैसे विहान पर विहंग नदी
तरुणाई की, तरल छवि की, अपनी अपनी जिद पर दोनों
डर है ज़माना जीत न जाये, तुझसे चपल मति की जंग नदी
लाखों झंझावात सहेजे, मुस्काये, बस बढ़ती जाए
स्वच्छंद सरल प्रवृति अपनाये, अब चली 'ख़ुशी' के संग नदी

Saturday, 28 February 2015

वो लड़की

सुनसान सड़क पर, तनहा सी..
बारिश में चलती वो लड़की
तीन सौ छप्पन बंदिशों में
बेबाक सी पलती वो लड़की...
भीगे उसके चेहरे पर यूँ तो
कुछ खास मुझे अंदाज नहीं...
वो पानी है या आंसू हैं...
है आँखें मलती वो लड़की....
वो सन्नाटों का खौफ है या फिर
दुनिया से उलझने का लावा...
क्या बात है ठंडी बूंदो से
बेजार उबलती वो लड़की
एक अनजाना डर सा है...
न सामने उसके पड़ जाऊं
मैं राह कोई भी चुनती हूँ
हर तौर निकलती वो लड़की..
उसके अंदर भी बेशक
अरमानों को पलते देखा है..
जब कच्ची इमली तोड़ सके..
पंजों पे उछलती वो लड़की...
कोई शौक नही, सरोकार नही
बस इतना उसको जाना है
कुछ तो ऐसा है जिस पर
है सबको खलती वो लड़की..

Thursday, 26 February 2015

वहम

न तोड़ गुलाबी जंजीरें..
जीने का सबब उन यादों की..
हम सब्र रखेंगे कायम  बस..
वो सच न हो तो हो वहम सही...
बात न कर, फ़रियाद न सुन
न कोई तमन्ना पूरी कर...
कोई खबर न ले, एहसान न कर..
तू कर दे इतना रहम सही...!!
कल भी तूफ़ान आया था...
मुझ पर आजमाने वजूद तेरा...
कहा हो जैसे खौफ के मद्दे
तू थोड़ा सा तो सहम सही....!!!
बेवफा हुए, बेकदर हुए
और हुए कभी बेपरवाह भी....
अपनी तानाशाही पर दुनिया हमको
बेरहम कहे, बेरहम सही...!!!
कहता रहा ज़माना मुझको...
वहम है उसका प्यार मगर....
मेरी 'ख़ुशी ' से बावस्ता...
वो वहम अगर है, वहम सही...!!

Monday, 16 February 2015

आजमाइश



हर बार ख़ुदा ने पूछा है...
क्यों करता कोई फरमाइश नहीं...
मैं सोच सोच कर हैरान हूँ
क्या दिली तेरी कोई ख्वाइश नहीं...
महज़ किसी उम्मीद से मेरी
न उसकी खुदाई कमतर हो..
वरक-ए- हयात सब आब-ए- ज़ार के
क्या काफी ये पैदाइश नहीं...
हर बार के जीने मरने से
एक बार किसी से बैर सही,
क्या साथ निभाने की रस्मे........
जब थोड़ी सी गुंजाईश नहीं.........
ताउम्र बहारों का वादा कर...
गुलशन कितने वीरान हुए....
उनसे भी कोई उन्स नहीं...
कोई सीख नहीं, समझाइश नहीं...
बस एक मेरी गुजारिश है...
तू अपनी खुदाई पे नाज न कर....
मैं कोई तमन्ना न रक्खूँ.....
कर मेरी भी आजमाइश नहीं.....!!!



Sunday, 27 July 2014

My Masterpiece -part 3

पुष्प, पवन, पावक, पंछी, पथ व पथिक से स्वछन्द सरल
बेल, बयार, विचार, बसंत, किस सम हो ऐसे तीव्र चपल
सब संसार से सारा हटकर,
सौ संकट के सम्मुख डटकर
थोड़ा थोड़ा सब में बँटकर भी,
पूरे स्वयं सदा हो जाते हो...!!

गुंचे चटकें कचनारों के, पर मुझको उस तरुवर से क्या,
मेरी तृप्ति कुछ प्रेम कणों में, मुझको किसी सरोवर से क्या,
तुम निराकार, मैं साकार छवि,
तुम निराधार, मैं आधार शिला,
तुम एक अदृश्य अहसास मेरा
जो आकर गुमहो जाते हो...!!

निशा चली, निशीथ चला, पर नयनो को नींद सुहाए नही,
हंसी ठिठोली, रूप, रंगोली, श्रृंगार, सहेली भाये नही,
बन बावरिया शिख से पग तक,
राह तकूँ मैं डग से जग तक,
पहुँच सकूँ मैं तुम तक तब तक,
विहान अगम्य हो जाते हो..........!!

Wednesday, 7 May 2014

अलफ़ाज़ अधबुने

जब किश्तों किश्तों में दिल के किस्से कुछ धुंधलाने लगते हैं...
तब सारी रात सदी सी लम्बी, और ख्वाब पुराने लगते हैं....
जब आँखें नम हों, आंसू मलहम हो, गम जख्म जलाने लगता है 
पीछे छूटा एक एक लम्हा, दिल बहलाने लगता है............
जब बातें नई पुरानी मिलकर पूरी दुनिया बन जाती है
दिन भर की रस्मो के बोझ तले जब शाम की छतरी तन जाती है..
तब रात के जानिब बढ़ते लम्हे, कोई बीमारी लगते हैं...
और भींगे भींगे पन्नो पे अलफ़ाज़ अधबुने बस जिम्मेदारी लगते हैं..  

सावन की कोई अलसाई सुबह जब बारिश की बूंदे लाती है..
मिट्टी की वो भीनी खुशबु, हर पल ताज़ा कर जाती है...
जब गली से बहते पानी के रेले सारा बचपन लगते हैं..
तब सारे जहां की शानो शौकत, धन दौलत बेमन लगते हैं
धूल की परतें सनी हुई जब आधी सी कहानी मिलती है 
या किसी पुरानी किताब तले जब लोगों की निगरानी मिलती है 
तब जीने के सब ढोंग किसी नाटक की बस हिस्सेदारी लगते हैं  
और भींगे भींगे पन्नो पे अलफ़ाज़ अधबुने बस जिम्मेदारी लगते हैं..

जब हरी भरी फ़िज़ा का रस्ता, पतझड़ के जंगल को जाता है..
सब कुछ होकर बेहतर भी मन अनायास बोझिल हो जाता है 
जब बेवजह की रस्में जी के जंजाल बढ़ाने लगती हैं
टूटे हुए विश्वास की किरचें, रह रहकर चिढ़ाने लगती हैं
जब दर्द का साया फैले इतना की आकाश बनाने लगता है 
छोटी छोटी चुभनों का खंजर, बस वफ़ा निभाने लगता है  
हयात आवारा लगती है, कायनात बेमानी होती है 
मेरी ही दुनिया है लेकिन, चाहे जिसकी मनमानी होती है 
तब सारे लोग 'ख़ुशी' के दुश्मन, बारी बारी लगते हैं....
और भींगे भींगे पन्नो पे अलफ़ाज़ अधबुने बस जिम्मेदारी लगते हैं  

जब चाँद के बिस्तर पे अंगड़ाई, सोने की तैयारी करती है
कोई तड़पती आह मगर, नींद की पहरेदारी करती है
जब ज़र्रा ज़र्रा तन्हाई, फ़क़त अफ़साना बनाने वाली हो
ज़िंदा रहने की सच्चाई, अरमान जलाने वाली हो....
तब मन के संशय झुठलाने के सब राज बेगाने लगते हैं
ख़ुशी महज एक परछाई, जहां सब लोग दीवाने लगते हैं..!!


जब जान से ज्यादा बढ़कर भी कोई ख्वाब हंसी बन जाता है....
मन और धड़कन के बीच अनकहा अलगाव गजब ठन जाता है
जब दिल की चाहत, हर हसरत, हर सांस पे भारी लगती हो
जब प्यार किसी के पास हो गिरवी, हयात उधारी लगती हो
तब चेहरे की हर परत, हर शिकन, कोई हार करारी लगते हैं
और भींगे पन्नो पे अलफ़ाज़ अधबुने , बस एक जिम्मेदारी लगते हैं....!!




Sunday, 6 April 2014

मिसालेदोस्ती

करता है तारीफ अब भी, जहां अपने साथ का

बरसो से है, बरसो रहेगा, गुणगान अपने साथ का

हम मिसालेदोस्ती की गिरफ्त में हैं आजतक 

लोग करते आज भी हैं, किस्सा बयान अपने साथ का

चर्चे बहुत से हुए हैं, दोस्ती के का जहां में पर

मकसद रहा है हाँ बहुत महान अपने साथ का

एक मैं और एक तुम हैं, जान अपने साथ की

'ख़ुशी' को भी हो रहा है, भान अपने साथ का.....!! 

इंसानियत

इंसानियत हर रोज ही यहाँ छली जाती है
ये दुनिया है कि दुनिया के हर कूचे से, 
रोज चाँद जज्बातो की बलि जाती है...........

वो बात अलग है, वो और लोग हैं...
जिनके घर तक एहतरामो की गली जाती है......!!

जुल्मोसितम और दर्द का निकाह है देखो
एहसानों की, तानों की हल्दी माली जाती है....!!

उसके पड़ोस में आजकल कोई जख्मी है शायद
हर रोज उस तरफ नमक की डली जाती है..........!!

कल कहीं किसी का जश्न था, जलसा था
आज उसके यारों की टोली, जली जाती है.....!!

खूबसूरत गुलाब है तो, बदसूरती क्या है
जान से तो खिलती हुई कली जाती है.....!!

सुना है ख़ुशी आई है फिर गलती से इस गली 
आँख खुलते ही मगर हर 'ख़ुशी' चली जाती है.......!! 

गहमागहमी

रूत बदली, रुतबा बदला तो लोग ये सारे बदल गये
कुछ नाजुक कलियाँ बनी संगदिल, कुछ पत्थर भी पिघल गये

वही मोड़ है, वही रास्ता, वही पुराने रहवर भी......
लेकिन सफरेवजह औ मायनेमंजिल बदल गये 

बहुत हुआ चर्चा ऐ मसला, लम्बी लम्बी बात चली 
खुशफहमी में बीता किस्सा, किश्तो में किस्से निकल गये

प्यार, मोहब्बत, फ़िक्रोजिकर के सारे आलम डूब गये, 
रंजोगम कि लौ में शायद सारे जज्बे उबल गये 

सारे ख्वाब थे बावस्ता बस एक समुन्दर ऐ मंजर से
कुछ फिसले, कुछ डूबे, लेकिन कुछ बेचारे सम्हाल गये

चहक चहक क्र मन क पंछी कर तो चुके हैं काफी ज़िद
थोडा दान पानी डाला तो खुदबखुद सब बहल गये

यु तो खुदगर्जी, खुद्दारी के बहुतोबहुत से दौर चले 
क्या कारण, क्या वजह बनी कि लोग ये सारे उछल गये

साड़ी ज़द्दोजहद में सबके हाथ बहुत कुछ आया तो
यु ही सारी गहमागहमी में 'ख़ुशी' के लम्हे फिसल गये......!!

  


Sunday, 30 March 2014

जलते शोले

सर्द फ़िज़ाएं हर शाम सहर अब
बर्फ हवा में जैसे घोलें.......

कभी कभी मिलती है फुर्सत
कुछ मैं बोलूं, कुछ तू बोले......

मन में टीस सी उठती है की 
जुबाँ कहीं ये राज न खोले 

न जाने कब जुल्फ के बादल 
कचनारों के अंक में सोले

दिल कहता है मौका मिलते ही
मन के कलुष को प्रेम से धोले 

बहुत देर हुई चर्चा करते 
राख में दब गये जलते शोले.......!!