Tuesday, 5 July 2016


२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल


गीली माटी पर एड़ी रखकर गोल घुमाना याद है
रंग बिरंगी बना पतंगें, छत पे उड़ाना याद है 


छोटे बड़े कंचों के खजाने का, जान से प्यारा हो जाना 
चुपके चुपके मम्मी के पर्स से टॉफ़ी खाना याद है..


हर साइज के गुड्डे गुड़िया लेकर, रोजाना उनकी लाइफ चलाना
एक दूजे के बाल बनाना, मेकअप करना याद है...


घर की टंकी पर डॉल का स्विमिंग पूल बनाना याद है...
carrom की गोटी हम वाइट ही लेंगे, उस पर लड़ना याद है. .


पथ कुटटे के गेम खेलने गिट्टी से, वो 5 'नगीने' चुन लाना 

बाजू वाली आंटी के छत से, पोटैटो चिप्स चुराना याद है 

खेल खिलौनों के बटवारे पर कितनी भी हाथापाई हो जाए
कितनी भी हो जाए लड़ाई, मम् को न बताना याद है...


डॉल का बर्थडे, डॉल की वेडिंग..हर बात पे महीनों की प्लानिंग..
पॉकेट मनी से 'नन्दीश्वर पार्क' में पिकनिक जाना याद है...


फॉक्स किड्स की मिमिक्स में घर जो चिड़ियाघर बन जाता था....
मम्मी के ऑफिस से आने से पहले, आनन फानन में जमाना याद है.


25K per month कमाकर भी खुश न रहने वाली जनरेशन को,
२5 पैसे per hour रेंटल साइकिल पर दुनिया पा जाना याद है...

Friday, 18 September 2015

'हृदयहीनता'

निपट सरल भी और अविरल भी,
निर्भेद्य भी हैं, निर्बाध भी फिर भी
निराधार नियत नियमों के चलते...
किंचित वे निष्ठुर बनकर रहते हैं.........
निश्चितता पर भी निश्चिंत नहीं..
निर्भीक नहीं..निष्फिक्र नहीं
ये कैसी निर्ममता है जिसके नाते
निष्ठा को भी निरर्थक कहते हैं..
निराकार निपट कुछ भाव निरंकुश...
निर्दोष नही रह जाते उस क्षण
नीर भरे दो नयन निरीह जब....
निश्छलता का फल सहते हैं..
निर्माण भी हैं...निर्याणक भी हैं
और निर्माण के निर्णायक फिर भी
अपनी निष्ठुरता को न जाने क्यूँ,
'हृदयहीनता' कहते हैं.....

सिरफिरा


अमूमन लोग जीते हैं 
बड़ी तरकीब से जिंदगानी...
वो बेतरतीब है, तो मेरी
 मानिंद ही सिरफिरा होगा...


सबेरे किश्तीगीर सारे
 चुन लाये समुन्दर से मोती...
मेरी ही आँख से कल रात
 आंसू कोई गिरा होगा...

शहर में चर्चे बहुत हैं..
किसी को गहरी शिकायत है..
गिला क्या, बेशक वो
 पुराना दोस्त मिरा होगा.....

ऐ बदनसीबी तेरा शैतान है मालिक,
 तो मेरा भी ख़ुदा है..
फिर फ़िज़ा के हाथो 
खिज़ा का मजा किरकिरा होगा.... 

Tuesday, 24 March 2015

तन्हापन

जितना प्यारा मुझको है तन्हापन...
उसकी आँखों से भी बहता होगा
सबके गम ढो लेने वाला.........
बोझ दिलों के सहता होगा....
काश कहीं से फिर आ जाये...
दिन रंग बिरंगे जज्बातों वाले..
मैं अपने सपने जी भर रंग लूँ...
खुद से ही वो कहता होगा...
गिन गिन कर दिन जीते जीते
उसने भी उम्र निभाई होगी
सबका साथ निभाने वाला..
तनहा तनहा रहता होगा...

Saturday, 7 March 2015

नदी

ऐसा भी क्या प्रेम नदी, ऐसा भी क्या रसरंग नदी
लोगों के लांछन, कलंक सब पाप करे बेरंग नदी
घट भरवाये, घाट बनवाए, घूंघट वालियों का पनघट छुड़वाए
हम में भी इठलाहट भर दे, तेरी मौज मजे की तरंग नदी 
कभी सिमटती, कभी मचलती, कभी उमड़ती, कभी सिकुड़ती
 कहाँ से लाये हमें दिखाने इतने रूप और रंग नदी 
जब प्यासे पथिक, पंछी, पशुओं को जी भर तृप्त यूँ करती है
उल्लास की बनकर नई परिभाषा, दे गयी खूब उमंग नदी...
जंगल में दरबार लगा, बैठे पवन, नदी, पथ, नग, मेघा, घन सब
अपनी परोपकारिता के दम पर, हो गयी सबमे दबंग नदी
आँखें मलकर, अपने अंचल पर, कूड़ा करकट जब देखा तो
उफ़ कैसी लानत है जीवन पर, हो गयी जन जन पर दंग नदी
सोलह बरस की नवयौवना सी, किसी पर्वत से उदित हो आई थी
लोगों की मलिनता धोते धोते, होती गयी बेढंग नदी..
हार गयी, अब चलते चलते, सागर में समाहित होने को ....
समझ बैठे सब प्राण-रहित, हो गयी सबसे तंग नदी....
कोई बाँध न पाये, रोक सके न, तुझमे बह ले पर सोख सके न
तू अचला पर उतनी ही चंचल, जैसे विहान पर विहंग नदी
तरुणाई की, तरल छवि की, अपनी अपनी जिद पर दोनों
डर है ज़माना जीत न जाये, तुझसे चपल मति की जंग नदी
लाखों झंझावात सहेजे, मुस्काये, बस बढ़ती जाए
स्वच्छंद सरल प्रवृति अपनाये, अब चली 'ख़ुशी' के संग नदी

Saturday, 28 February 2015

वो लड़की

सुनसान सड़क पर, तनहा सी..
बारिश में चलती वो लड़की
तीन सौ छप्पन बंदिशों में
बेबाक सी पलती वो लड़की...
भीगे उसके चेहरे पर यूँ तो
कुछ खास मुझे अंदाज नहीं...
वो पानी है या आंसू हैं...
है आँखें मलती वो लड़की....
वो सन्नाटों का खौफ है या फिर
दुनिया से उलझने का लावा...
क्या बात है ठंडी बूंदो से
बेजार उबलती वो लड़की
एक अनजाना डर सा है...
न सामने उसके पड़ जाऊं
मैं राह कोई भी चुनती हूँ
हर तौर निकलती वो लड़की..
उसके अंदर भी बेशक
अरमानों को पलते देखा है..
जब कच्ची इमली तोड़ सके..
पंजों पे उछलती वो लड़की...
कोई शौक नही, सरोकार नही
बस इतना उसको जाना है
कुछ तो ऐसा है जिस पर
है सबको खलती वो लड़की..