Saturday, 7 March 2015

नदी

ऐसा भी क्या प्रेम नदी, ऐसा भी क्या रसरंग नदी
लोगों के लांछन, कलंक सब पाप करे बेरंग नदी
घट भरवाये, घाट बनवाए, घूंघट वालियों का पनघट छुड़वाए
हम में भी इठलाहट भर दे, तेरी मौज मजे की तरंग नदी 
कभी सिमटती, कभी मचलती, कभी उमड़ती, कभी सिकुड़ती
 कहाँ से लाये हमें दिखाने इतने रूप और रंग नदी 
जब प्यासे पथिक, पंछी, पशुओं को जी भर तृप्त यूँ करती है
उल्लास की बनकर नई परिभाषा, दे गयी खूब उमंग नदी...
जंगल में दरबार लगा, बैठे पवन, नदी, पथ, नग, मेघा, घन सब
अपनी परोपकारिता के दम पर, हो गयी सबमे दबंग नदी
आँखें मलकर, अपने अंचल पर, कूड़ा करकट जब देखा तो
उफ़ कैसी लानत है जीवन पर, हो गयी जन जन पर दंग नदी
सोलह बरस की नवयौवना सी, किसी पर्वत से उदित हो आई थी
लोगों की मलिनता धोते धोते, होती गयी बेढंग नदी..
हार गयी, अब चलते चलते, सागर में समाहित होने को ....
समझ बैठे सब प्राण-रहित, हो गयी सबसे तंग नदी....
कोई बाँध न पाये, रोक सके न, तुझमे बह ले पर सोख सके न
तू अचला पर उतनी ही चंचल, जैसे विहान पर विहंग नदी
तरुणाई की, तरल छवि की, अपनी अपनी जिद पर दोनों
डर है ज़माना जीत न जाये, तुझसे चपल मति की जंग नदी
लाखों झंझावात सहेजे, मुस्काये, बस बढ़ती जाए
स्वच्छंद सरल प्रवृति अपनाये, अब चली 'ख़ुशी' के संग नदी

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