Monday, 16 February 2015

आजमाइश



हर बार ख़ुदा ने पूछा है...
क्यों करता कोई फरमाइश नहीं...
मैं सोच सोच कर हैरान हूँ
क्या दिली तेरी कोई ख्वाइश नहीं...
महज़ किसी उम्मीद से मेरी
न उसकी खुदाई कमतर हो..
वरक-ए- हयात सब आब-ए- ज़ार के
क्या काफी ये पैदाइश नहीं...
हर बार के जीने मरने से
एक बार किसी से बैर सही,
क्या साथ निभाने की रस्मे........
जब थोड़ी सी गुंजाईश नहीं.........
ताउम्र बहारों का वादा कर...
गुलशन कितने वीरान हुए....
उनसे भी कोई उन्स नहीं...
कोई सीख नहीं, समझाइश नहीं...
बस एक मेरी गुजारिश है...
तू अपनी खुदाई पे नाज न कर....
मैं कोई तमन्ना न रक्खूँ.....
कर मेरी भी आजमाइश नहीं.....!!!



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